शनिवार, 11 जुलाई 2009

एक छोटे शहर की लड़की (२)

रिक्शे पर बैठी जो हमेशा
सखियों के साथ
बस की भीड़ में आज
धक्के खाती है,
शाम को कमरे पर आकर
एक-एक पैसे का
हिसाब लगाती है,
पढाई भी करती है
काम पर भी जाती है,
परम्परा और आधुनिकता में
मेल बैठाती है
महानगर की लड़कियों से
अलग नज़र आती है
एक छोटे शहर की लड़की
जब महानगर में आती है
धीरे-धीरे
भोली-भाली सकुचाई से
सयानी बन जाती है.

महानगर

मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

एक छोटे शहर की लड़की (१)

एक छोटे शहर की लड़की
आँखों में हज़ारों सपने लिए
आती है महानगर में,
अकेली लड़ती है
अपने अस्तित्व को
मिटने से बचाने के लिए,
एक पहचान हो उसकी भी
बस इतना चाहती है,
और इसके लिए
रोज़
एक नया गुर
सीखती जाती है।

बुधवार, 8 जुलाई 2009

एक छोटा सा घर

चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो
ताकि हवाएँ बिना रोक-टोक
इधर से उधर जा सकें

एक छोटा सा घर

चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो
ताकि हवाएँ बिना रोक-टोक
इधर से उधर जा सकें

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

पहचान


इस भीड़ में चेहरे हैं बहुत
पर कोई पहचाना
चेहरा नहीं मिलता.
चेहरों के पीछे चेहरें हैं
और उसके भी पीछे चेहरे
अपनों के बीच भी कोई
अपना नहीं मिलता.
क्यूँ अपनी पहचान को
छिपाते हैं यहाँ लोग
जो जहाँ जैसा है क्यूँ
वैसा नहीं मिलता.